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Friday, May 29, 2015

होना - न होना !

सदा संभव रहता है
जो नहीं हुआ उसका हो जाना

न होना
नहीं हो पाता
कभी किसी हुए का

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- कुलजीत सिंह


























प्रस्तुति - जय प्रकाश मानस

लायब्रेरी समृद्ध हुई !

आज दो किताबें मिलीं-सौगात में । आदरणीय हरीश पाठक जी से । पहली 'सोलह कहानियाँ' और दूसरी 'त्रिकोण के तीनों कोण' ।
हरीश जी देश के उन प्रतिष्ठित पत्रकार और कथाकारों में एक हैं जिन्हें दिल्ली प्रेस समूह, धर्मयुग, दैनिक हिन्दुस्तान, नवभारत समूह और राष्ट्रीय सहारा जैसे बड़े प्रतिष्ठानों में संपादक होने का गौरव हासिल है ।
नौ साल तक धर्मयुग में प्रकाशित उनके स्तंभ 'सुर्खियों के पीछे' को कैसे भूला जा सकता है । इसके लिए उन्हें उत्तरप्रदेश शासन का गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार मिला । जीटीवी के इलेक्शन स्पेशल में 110 कड़ियों में प्रसारित धारावाहिक जन गण मन और 60 कड़ियों में प्रसारित पोल टाइम्स का लेखन भी श्री पाठकजी ने किया । उन्हें मध्यप्रदेश शासन का राजेद्र माथुर स्मृति पत्रकारिता फैलोशिप भी हस्तगत हो चुका है ।
ऐसे रचनाकारों की किताबें पाकर किसकी लायब्रेरी समृद्ध नहीं होगी ।
पाठक दादा, आभार आपका !

प्रस्तुति  - जय प्रकाश मानस

मेरे परिवार के सदस्य !

'पशु' शब्द अपनी लाक्षणिकता में भले ही उपेक्षणीय हो और भले ही हम उन्हें आज लगातार भूला रहे हैं, लेकिन एक महादेवी वर्माजी थीं, जिन्हें पशु-पक्षियों से अगाध स्नेह था ।
वे पहली ऐसी रचनाकार हैं जिन्होंने पशु-पक्षियों को 'मेरा परिवार' कहा ।
उनके परिवार के आँगन में तभी तो नीलकंठ मोर, राधा मोरनी, गिल्लू गिलहरी, सोना हिरनी, दुर्मुख खरगोश, गौरा गाय, नीलू कुत्ता, मूँगा मुर्गी, निक्की नेवला, रोजी कुत्तिया, रानी घोड़ी, आदि मज़े-मज़े में रहते हैं ।
आपके 'परिवार' में कौन-कौन रहते हैं ?
 प्रस्तुति - जय प्रकाश मानस

मैं शराब कैसे पी सकती हूँ ?

मीना कुमारी अभिनय और कला के लिए कितनी समर्पित थी, यह साबित होती है - साहब, बीबी और गुलाम फ़िल्म से ।
गुरुदत्त इस फ़िल्म के लिए जब मीना कुमारी के पास गए तो एकबारगी मीना से साफ़ इनकार करते हुए कहा कि पर्दे पर मैं शराब कैसे पी सकती हूँ ? भारतीय दर्शकों में मेरी इमेज़ से तो आप परिचित ही हैं ।
गुरुदत्त के चले जाने के बाद मीना ने सोचा कि, गुरुदत्त जैसे संजीदा और प्रतिभाशाली निर्माता और निर्देशक मेरे पास ही क्यों आए ? मीना ने विमल मित्र के उपन्यास 'साहिब, बीबी और गुलाम' को पढ़ा, जिसको आधार बनाकर फ़िल्म का निर्माण होना था । उपन्यास को पढ़ने के बाद मीना ने तुरंत ही गुरुदत्त को फ़ोन किया और कहा कि 'छोटी बहू' की भूमिका के लिए किसी अन्य को चुन न लिया हो तो मैं यह करने को तैयार हूँ । ('इंद्रप्रस्थ भारती' का नया अंक पढ़ते हुए)

प्रस्तुति  - जय प्रकाश मानस

माधव राव सप्रे पत्रकारिता सम्मान विजय को !

नेपाल में आयोजित दसवें अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में देश के प्रतिभावान पत्रकार विजय शंकर चतुर्वेदी को माधवराव सप्रे सम्मान से विभूषित किया गया ।
छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता के भीष्मपितामह कहे जाने वाले माधवराव सप्रे की स्मृति में दिया जानेवाला 2015 का यह सम्मान नेपाल और भारत की प्रमुख हस्तियों द्वारा पोखरा ( नेपाल ) में प्रदान किया गया ।
नेपाल के पूर्व सांसद, प्रख्यात साहित्यकार व प्रलेस, नेपाल के वाइस प्रेसीडेंट श्री गोपाल ठाकुर, डॉ. रंजना अरगड़े, डॉ. प्रेम जनमेजय, गिरीश पंकज, रामकिशोर उपाध्याय, राकेश अचल आदि अतिथियों द्वारा श्री चतुर्वेदी को अंगवस्त्रम्, प्रशस्ति पत्र व स्मृतिचिन्ह आदि भेंट किया गया ।
उल्लेखनीय है कि पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए 16 अप्रैल को लखनऊ में महामहिम राज्यपाल द्वारा और 6 मई को नारद जयंती पर वाराणसी में नेशनल बुक ट्रस्ट के चेयरमैन बलदेव भाई शर्मा और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के उपकुलपति गिरीश चंद्र त्रिपाठी द्वारा सम्मानित किया गया था ।
श्री चतुर्वेदी देश के प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े रहे हैं व वर्तमान में विन्ध्य न्यूज़ नेटवर्क के सभी प्रकाशनों के ग्रुप एडिटर हैं । आपकी आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हैं व कई देशों में आप व्याख्यान दे चुके हैं ।

प्रस्तुति  - जय प्रकाश मानस

Monday, May 25, 2015

लङ़की पैदा करने की है सख्त मनाही !

कोर्ट में एक अजीब मुकदमा आया
एक सिपाही एक कुत्ते को बांध कर लाया
सिपाही ने जब कटघरे में आकर कुत्ता खोला
कुत्ता रहा चुपचाप, मुँह से कुछ ना बोला..!
नुकीले दांतों में कुछ खून-सा नज़र आ रहा था
चुपचाप था कुत्ता, किसी से ना नजर मिला रहा था
फिर हुआ खड़ा एक वकील ,देने लगा दलील
बोला, इस जालिम के कर्मों से यहाँ मची तबाही है
इसके कामों को देख कर इन्सानियत घबराई है
ये क्रूर है, निर्दयी है, इसने तबाही मचाई है
दो दिन पहले जन्मी एक कन्या, अपने दाँतों से खाई है
अब ना देखो किसी की बाट
आदेश करके उतारो इसे मौत के घाट
जज की आँख हो गयी लाल
तूने क्यूँ खाई कन्या, जल्दी बोल डाल
तुझे बोलने का मौका नहीं देना चाहता
लेकिन मजबूरी है, अब तक तो तू फांसी पर लटका पाता
जज साहब, इसे जिन्दा मत रहने दो
कुत्ते का वकील बोला, लेकिन इसे कुछ कहने तो दो
फिर कुत्ते ने मुंह खोला ,और धीरे से बोला
हाँ, मैंने वो लड़की खायी है
अपनी कुत्तानियत निभाई है
कुत्ते का धर्म है ना दया दिखाना
माँस चाहे किसी का हो, देखते ही खा जाना
पर मैं दया-धर्म से दूर नही
खाई तो है, पर मेरा कसूर नही
मुझे याद है, जब वो लड़की छोरी कूड़े के ढेर में पाई थी
और कोई नही, उसकी माँ ही उसे फेंकने आई थी
जब मैं उस कन्या के गया पास
उसकी आँखों में देखा भोला विश्वास
जब वो मेरी जीभ देख कर मुस्काई थी
कुत्ता हूँ, पर उसने मेरे अन्दर इन्सानियत जगाई थी
मैंने सूंघ कर उसके कपड़े, वो घर खोजा था
जहाँ माँ उसकी थी, और बापू भी सोया था
मैंने भू-भू करके उसकी माँ जगाई
पूछा तू क्यों उस कन्या को फेंक कर आई
चल मेरे साथ, उसे लेकर आ
भूखी है वो, उसे अपना दूध पिला
माँ सुनते ही रोने लगी
अपने दुख सुनाने लगी
बोली, कैसे लाऊँ अपने कलेजे के टुकड़े को
तू सुन, तुझे बताती हूँ अपने दिल के दुखड़े को
मेरी सासू मारती है तानों की मार
मुझे ही पीटता है, मेरा भतार
बोलता है लङ़का पैदा कर हर बार
लङ़की पैदा करने की है सख्त मनाही
कहना है उनका कि कैसे जायेंगी ये सारी ब्याही
वंश की तो तूने काट दी बेल
जा खत्म कर दे इसका खेल
माँ हूँ, लेकिन थी मेरी लाचारी
इसलिए फेंक आई, अपनी बिटिया प्यारी
कुत्ते का गला भर गया
लेकिन बयान वो पूरे बोल गया....!
बोला, मैं फिर उल्टा आ गया
दिमाग पर मेरे धुआं सा छा गया
वो लड़की अपना, अंगूठा चूस रही थी
मुझे देखते ही हंसी, जैसे मेरी बाट में जग रही थी
कलेजे पर मैंने भी रख लिया था पत्थर
फिर भी काँप रहा था मैं थर-थर
मैं बोला, अरी बावली, जीकर क्या करेगी
यहाँ दूध नही, हर जगह तेरे लिए जहर है, पीकर क्या करेगी
हम कुत्तों को तो, करते हो बदनाम
परन्तु हमसे भी घिनौने, करते हो काम
जिन्दी लड़की को पेट में मरवाते हो
और खुद को इंसान कहलवाते हो
मेरे मन में, डर कर गयी उसकी मुस्कान
लेकिन मैंने इतना तो लिया था जान
जो समाज इससे नफरत करता है
कन्याहत्या जैसा घिनौना अपराध करता है
वहां से तो इसका जाना अच्छा
इसका तो मर जान अच्छा
तुम लटकाओ मुझे फांसी, चाहे मारो जूत्ते
लेकिन खोज के लाओ, पहले वो इन्सानी कुत्ते
लेकिन खोज के लाओ, पहले वो इन्सानी कुत्ते ..!!

मेरे मन का विस्तार इतने से भी ज़्यादा ...

खोलो मन के द्वार
बन्द क्यों हैं किवाड़
आने दो अतिथि को
और ताज़ी हवा

बन्द दरवाजों के भीतर
सीलन पैदा हो जाती
जाले बना लेतीं हमारी आशंकाओं की मकड़ी
हम उदासी कैद कर लेते

खुले दरवाजों से अवसर आते
ईश्वर भी नहीं चाहता बन्द हों कभी
मन के दरवाजों पर ताला
किसे लुभाता ?


 - राघव ,
अभी-अभी

Saturday, May 9, 2015

गजल !

मुलाकातें हमारी, तिश्नगी से
किसी दिन मर न जाएँ हम ख़ुशी से

मुहब्बत यूँ मुझे है बतकही से
निभाए जा रहा हूँ ख़ामुशी से

ये कैसी बेख़ुदी है जिसमे मुझको
मिलाया जा रहा हैं अब मुझी से

उतारो भी मसीहाई का चोला
हँसा बोला करो हर आदमी से

ख़बर से जी नहीं भरता हमारा
मजा आता है केवल सनसनी से

उजाला बांटने वालों के सदके
हमारी निभ रही है तीरगी से

ये बेदारी, ये बेचैनी का आलम
मैं आजिज़ आ गया हूँ शाइरी से


साभार  - वीनस केशरी
एक बात कहूं -
छोडो चलो जाने दो। 

अब कह भी दो - यारा
गले में लफ्ज अटक जाते हैं
उन्हें लबों तलक तो आने दो।

जो दिल में कैद बाते हैं
अब उन्हें - खुलके
बिखर जाने दो - जो आँखें
कह रही हैं - प्यार है तुमसे
चलो - अब इन्हें भी आजमाने दो।

गेसुओं में बदलियाँ हैं
बिजलियाँ - आज जीभर के
चमक जाने दो .
सूखे मुरझाये पड़े हैं ख्वाब -कई
इन्हें बारिश में और भीग जाने दो।

इतनी छोटी सी गुजारिश है
तुझसे मेरे खुदा। 

महुब्बत गर - उन्हें
हमी से है - ये बात यार -
जरा उनसे भी मनवाने दो !


- सतीश चंद्र शर्मा

बिटिया !

घर आने पर दौड़ कर जो पास आये, उसे कहते हैं "बिटिया"
थक जाने पर प्यार से जो माथा सहलाए, उसे कहते हैं "बिटिया"
"कल दिला देंगे" कहने पर जो मान जाये, उसे कहते हैं "बिटिया"
हर रोज़ समय पर दवा की जो याद दिलाये, उसे कहते हैं "बिटिया"
घर को मन से फूल सा जो सजाये, उसे कहते हैं "बिटिया"
सहते हुए भी अपने दुख जो छुपा जाये, उसे कहते हैं "बिटिया"
दूर जाने पर जो बहुत रुलाये, उसे कहते हैं "बिटिया"
पति की होकर भी पिता को जो ना भूल पाये, उसे कहते हैं "बिटिया"
मीलों दूर होकर भी पास होने का जो एहसास ''दिलाये, उसे कहते हैं "बिटिया"
"अनमोल हीरा" जो कहलाये, उसे कहते हैं "बिटिया" 

भगवान हर पिता को एक बेटी जरुर दे।

साभार  - दीपक बहल

एक युवक....

मैं तकरीबन 20 साल के बाद अपने शहर लौटा था!
बाज़ार में घुमते हुए सहसा मेरी नज़रें सब्जी का ठेला
लगाये एक बूढे पर जा टिकीं, बहुत कोशिश के बावजूद
भी मैं उसको पहचान नहीं पा रहा था !
लेकिन न जाने बार बार ऐसा क्यों लग रहा था की मैं
उसे बड़ी अच्छी तरह से जनता हूँ !
मेरी उत्सुकता उस बूढ़े से भी छुपी न रही , उसके
चेहरे पर आई अचानक मुस्कान से मैं समझ गया था
कि उसने मुझे पहचान लिया था !
काफी देर की जेहनी कशमकश के बाद जब मैंने उसे
पहचाना तो मेरे पाँव के नीचे से मानो ज़मीन खिसक
गई !
जब मैं विदेश गया था तो इसकी एक बहुत बड़ी आटा
मिल हुआ करती थी नौकर चाकर आगे पीछे घूमा करते
थे ! धर्म कर्म, दान पुण्य में सब से अग्रणी इस
दानवीर पुरुष को मैं ताऊजी कह कर बुलाया करता था !
वही आटा मिल का मालिक और
आज सब्जी का ठेला लगाने पर मजबूर?
मुझसे रहा नहीं गया और मैं उसके पास जा पहुँचा और
बहुत मुश्किल से रुंधे गले से पूछा :
"ताऊ जी, ये सब कैसे हो गया?"
भरी ऑंखें लिए मेरे कंधे पर हाथ रख उसने उत्तर
दिया:-
"बच्चे बड़े हो गए हैं बेटा" !


- साभार  अमित त्रिपाठी

रक्त में ख़ुशी !

मैंने पूछा
थोड़े संकोच थोड़े स्नेह से

कैसे हैं पति
हैं तुम्हारे अनुकूल

उसने कहा
मुदित मन से लजाते हुए

जी बहुत सहयोगी हैं
समझते हैं मेरी सीमा
अपनी भी

उस दिन मेरा मन बतियाता रहा हवाओं से फूलों से
पूछता रहा हालचाल राह के पत्थरों से
प्रसन्नता छलकती रही रोम-रोम से
यूँ ही टहलते हुए चबा गया नीम की पत्तियाँ
पर ख़ुशी इस क़दर थी रक्त में कि कम न हुई मन की मिठास

मैंने ख़ुद से कहा
चलो ख़ुश तो है एक बेटी किसी की
और भी होंगी धीरे-धीरे 


-------------------
- जितेन्द्र श्रीवास्तव
-------------------

Tuesday, April 21, 2015

***गजले मीर रहेगी***

जब तक दिल में पीर रहेगी.
गजलों की जागीर रहेगी.
खीर अगर नमकीन बना दो,
तो फिर क्या वो खीर रहेगी ?
राँझे तब तक पैदा होंगे,
जब तक कोई हीर रहेगी.
बँटवारे में सब कुछ ले लो,
मेरे सँग तकदीर रहेगी.
दिल में इमारत बन जाये तो,
होकर वो तामीर रहेगी.
महँगी मढ़ने से क्या हरदम,
ज्यों की त्यों तस्वीर रहेगी ?
हम न रहेंगे तो भी क्या है,
अपनी एक नजीर रहेगी.
कल भी अदब की बातें होंगी,
कल भी गजले-मीर रहेगी. 


डाॅ.कमलेश द्विवेदी
मो.9415474674

Friday, February 13, 2015

आओ अपनी-अपनी क़िस्मत बदलते हैं..

आओ अपनी-अपनी क़िस्मत बदलते हैं..

अपना गुज़रा हुआ कल अभी ज़्यादा पीछे नहीं गया है
फिर उसी सिफ़र से शुरू करते हैं
नाम-रंग-जाति-धर्म हर कुछ
जिन-जिन का वास्ता है क़िस्मत के साथ
उन सबको बदलते हैं
आओ अपनी-अपनी क़िस्मत बदलते हैं...
 
मैं कुछ भी नहीं सोचूंगा... तुम सोचना
मैं कुछ भी नहीं बोलूंगा.... तुम बोलना
मैं किसी से नहीं लडूंगा... तुम लड़ना
मैं कुछ नहीं चाहूंगा... तुम चाहना
तुम सपने देखना... तुम ही उन्हें पूरा करना
हां तुम्हारी शर्तों पर ही ये खेल खेलते हैं
आओ अपनी-अपनी क़िस्मत बदलते हैं...

तुम मेरी ज़िन्दगी बस एक बार जी लो
मैं तुम्हारी हर ज़िन्दगी बग़ैर शिक़ायत किए जी लूंगा
चलो तुम्हारी मनचाही मुराद पूरी करते हैं
आओ अपनी-अपनी क़िस्मत बदलते हैं...

चलो एक और वादा करता हूं
मैं नहीं चिढ़ाउंगा तुम्हें हर हार पर
जैसे तुम और बाक़ी लोग चिढ़ाया करते थे
मैं नहीं जलील होने दूंगा तुम्हें सबके सामने
और हां आईने में शक़्ल देखने से भी नहीं रोकूंगा

 क़बूल कर लो कि अब ये मेरी भी ख़्वाहिश है
आओ एक-दूसरे की ज़िन्दगी जीते हैं
आओ अपनी-अपनी क़िस्मत बदलते हैं...

साभार  - हिन्द-युग्म

Thursday, February 5, 2015

कहना है माटी को आभार !

कहना है
माटी को दिल से आभार !
एक तुम्हीं जिसमें मैं अँकुराया, खिलखिलाया
छू सका असीम का विस्तार

कहना ही है उन संगी-साथियों को
जो गलियों में उबे बिना अगोरते रहे
और भूलूँ कैसे पेड़ों की वे डालियाँ
उदासियों में मुझे जो झकझोरते रहे

आभार उस झरने का
जिसने मुझे बहना सिखाया
दरअसल पत्थरों को गहना बताया

माँ की छाती का आभार
जहाँ मैंने पाया जीवन का अमृत
अपरिमित, अपार

आभार ! आभार !! आभार !!!
उन सारे बुरे दिनों के प्रति
जो दिखते नहीं अब कहीं
पर रह-रहकर आते हैं जब कभी याद
तब-तब मुझसे करता है जीवन डरकर संवाद ।

कहना है माटी को आभार 
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कहना है  
माटी को दिल से आभार ! 
एक तुम्हीं जिसमें मैं अँकुराया, खिलखिलाया
छू सका असीम का विस्तार 

कहना ही है उन संगी-साथियों को  
जो गलियों में उबे बिना अगोरते रहे
और भूलूँ कैसे पेड़ों की वे डालियाँ 
उदासियों में मुझे जो झकझोरते रहे 

आभार उस झरने का 
जिसने मुझे बहना सिखाया
दरअसल पत्थरों को गहना बताया 

माँ की छाती का आभार 
जहाँ मैंने पाया जीवन का अमृत
अपरिमित, अपार  

आभार ! आभार !! आभार !!!
उन सारे बुरे दिनों के प्रति
जो दिखते नहीं अब कहीं 
पर रह-रहकर आते हैं जब कभी याद 
तब-तब मुझसे करता है जीवन डरकर संवाद ।
 साभार  :- जय प्रकाश "मानस"