Friday, August 24, 2012

तादाद शाइरो की वही 'पौने तीन' है।


हम को भी अपनी मौत का पूरा यकीन है
पर दुश्मनो के मुल्क मे इक महजबीन है

सर पर खडे है चान्द सितारे बहुत मगर
इंसान का जो बोझ उठा ले ज़मीन है

ये आखरी चराग उसी को बुझाने दो
इस बस्ती मे वो सब से जियादा हसीन है

तकिये के नीचे रखता है त्स्वीर की किताब
तहतीरो गुफ्तगू मे जो इतना मतीन है

अश्को की तरह थम गई जज्बो की नागिने
बेदार मेरे होटो पे ल्फ्जो की बीन है

यारो ने जिस पे अपनी दुकाने सजाई है
खुश्बू बता रही है ह्मारी ज़मीन है

तफसील क्या बताये हमारे भी अहद मे
तादाद शाइरो की वही 'पौने तीन' है।
( डा. बशीर बद्र )

1 comment: