Friday, December 20, 2013

मेरी ख्वाइश ......

वह प्राइमरी स्कूल की टीचर थी |
सुबह उसने बच्चो का टेस्ट लिया था
और उनकी कॉपिया जाचने के लिए
घर ले आई थी | बच्चो की कॉपिया
देखते देखते उसके आंसू बहने लगे | उसका पति वही लेटे TV देख रहा था |

उसने रोने का कारण पूछा ।
टीचर बोली , “सुबह मैंने बच्चो को
‘मेरी सबसे बड़ी ख्वाइश’ विषय पर कुछ
पंक्तिया लिखने को कहा था ; एक बच्चे
ने इच्छा जाहिर करी है की भगवन उसे
टेलीविजन बना दे |
यह सुनकर पतिदेव हंसने लगे |

टीचर बोली , “आगे तो सुनो बच्चे ने
लिखा है यदि मै TV बन जाऊंगा, तो
घर में मेरी एक खास जगह होगी और
सारा परिवार मेरे इर्द-गिर्द रहेगा |

जब मै बोलूँगा, तो सारे लोग मुझे ध्यान से सुनेंगे | मुझे रोका टोका नहीं जायेंगा
और नहीं उल्टे सवाल होंगे |

जब मै TV बनूंगा, तो पापा ऑफिस से
आने के बाद थके होने के बावजूद मेरे
साथ बैठेंगे | मम्मी को जब तनाव होगा,
तो वे मुझे डाटेंगी नहीं, बल्कि मेरे साथ
रहना चाहेंगी | मेरे बड़े भाई-बहनों के
बीच मेरे पास रहने के लिए झगडा होगा |

यहाँ तक की जब TV बंद रहेंगा, तब भी
उसकी अच्छी तरह देखभाल होंगी |

और हा, TV के रूप में मै सबको ख़ुशी
भी दे सकूँगा | “
यह सब सुनने के बाद पति भी थोड़ा
गंभीर होते हुए बोला ,
‘हे भगवान ! बेचारा बच्चा …. उसके
माँ-बाप तो उस पर जरा भी ध्यान नहीं
देते !’

टीचर पत्नी ने आंसूं भरी आँखों से
उसकी तरफ देखा और बोली,
“जानते हो, यह बच्चा कौन है? ………………………हमारा अपना बच्चा……
.. हमारा छोटू |”
 

सोचिये, यह छोटू कही आपका बच्चा
तो नहीं ।

मित्रों , आज की भाग-दौड़ भरी ज़िन्दगी
में हमें वैसे ही एक दूसरे के लिए कम
वक़्त मिलता है , और अगर हम वो भी
सिर्फ टीवी देखने , मोबाइल पर गेम
खेलने और फेसबुक से चिपके रहने में
गँवा देंगे तो हम कभी अपने रिश्तों की
अहमियत और उससे मिलने वाले प्यार
को नहीं समझ पायेंगे।

ग़ज़ल !

सुना है रब्त है उसको ख़राब हालों से
सो अपने आप को बरबाद कर के देखते हैं

सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उसकी
सो हम भी उसकी गली से गुज़र के देखते हैं

सुना है उसको भी है शेर-ओ-शायरी से शगफ़
सो हम भी मोजज़े अपने हुनर के देखते हैं

सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं

सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है
सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं

- अहमद फराज

Monday, September 23, 2013

गजल !

तू दर्दे-दिल को आईना  बना लेती  तो  अच्छा था
मोहब्बत की कशिश दिल में सजा लेती तो अच्छा था

बचाने के लिए तुम खुद को आवारा-निगाही से
निगाहे-नाज को खंजर बना लेती तो अच्छा था

तेरी पलकों के गोशे में कोई आंसू जो बख्शे तो
उसे तू खून का दरिया बना लेती तो अच्छा था

सुकूं मिलता जवानी की तलातुम-खेज मौजों को
किसी का ख्वाब आंखों में बसा लेती तो अच्छा था

ये चाहत है तेरी मरजी, मुझे  चाहे न चाहे तू
हां, मुझको देखकर तू मुस्कुरा देती तो अच्छा था

तुम्हारा हुस्ने-बेपर्दा  कयामत-खेज है कितना
किसी के इश्क को पर्दा बना लेती तो अच्छा था

तेरी निगहे-करम के तो दिवाने हैं सभी लेकिन
झुका पलकें किसी का दिल चुरा लेती तो अच्छा था

किसी के इश्क में आंखों से जो बरसात होती है
उसी बरसात में तू भी नहा लेती तो अच्छा था

तेरे जाने की आहट से किसी की जां निकलती है
खुदारा तू किसी की जां बचा लेती तो अच्छा था

 
- रचनाकार वसीम अकरम

बात पर बात होता बात ओराते नइखे !

बात पर बात होता बात ओराते नइखे
कवनो दिक्कत के समाधान भेंटाते नइखे

भोर के आस में जे बूढ़ भइल, सोचत बा
मर गइल का बा सुरुज रात ई जाते नइखे

लोग सिखले बा बजावे के सिरिफ ताली का
सामने जुल्म के अब मुठ्ठी बन्हाते नइखे

कान में खोंट भरल बा तबे तऽ केहू के
कवनो अलचार के आवाज़ सुनाते नइखे

ओद काठी बा, हवा तेज बा,किस्मत देखीं
तेल भरले बा, दिया-बाती बराते नइखे

मन के धृतराष्ट्र के आँखिन से सभे देखत बा
भीम असली ह कि लोहा के, चिन्हाते नइखे

बर्फ हऽ, भाप हऽ, पानी हऽ कि कुछुओ ना हऽ
जिन्दगी का हवे, ई राज बुझाते नइखे

दफ्न बा दिल में तजुर्बा त बहुत, ए ‘भावुक’
छंद के बंध में सब काहें समाते नइखे


- मनोज सिंह 'भावुक'

भवन माहात्म्य !

भवन मनुज की सभ्यता, ईश्वर का वरदान।
रहना चाहें भवन में, भू पर आ भगवान।१।

भवन बिना हो जिंदगी, आवारा-असहाय।
अपने सपने ज्यों 'सलिल', हों अनाथ-निरुपाय।२।

मन से मन जोड़े भवन, दो हों मिलकर एक।
सब सपने साकार हों, खुशियाँ मिलें अनेक।३।

भवन बचाते ज़िन्दगी, सड़क जोड़ती देश।
पुल बिछुडों को मिलाते, तरु दें वायु हमेश।४।

राष्ट्रीय संपत्ति पुल, सड़क इमारत वृक्ष।
बना करें रक्षा सदा, अभियंतागण दक्ष।५।

भवन सड़क पुल रच बना, आदम जब इंसान।
करें देव-दानव तभी, मानव का गुणगान।६।

कंकर को शंकर करें, अभियंता दिन-रात।
तभी तिमिर का अंत हो, उगे नवल प्रभात७।

भवन सड़क पुल से बने, देश सुखी संपन्न।
भवन सेतु पथ के बिना, होता देश विपन्न।८।

इमारतों की सुदृढ़ता, फूंके उनमें जान।
देश सुखी-संपन्न हो, बढ़े विश्व में शान।९।

भारत का नव तीर्थ है, हर सुदृढ़ निर्माण।
स्वेद परिश्रम फूँकता, निर्माणों में प्राण।१०।

अभियंता तकनीक से, करते नव निर्माण।
होता है जीवंत तब, बिना प्राण पाषाण।११।

भवन सड़क पुल ही रखें, राष्ट्र-प्रगति की नींव।
सेतु बना- तब पा सके, सीता करुणासींव।१२।

करे इमारत को सुदृढ़, शिल्प-ज्ञान-तकनीक।
लगन-परिश्रम से बने, बीहड़ में भी लीक।१३।

करें कल्पना शून्य में, पहले फिर साकार।
आंकें रूप अरूप में, यंत्री दे आकार।१४।

सिर्फ लक्ष्य पर ही रखें, हर पल अपनी दृष्टि।
अभियंता-मजदूर मिल, रचें नयी नित सृष्टि।१५।

सडक देश की धड़कनें, भवन ह्रदय पुल पैर।
वृक्ष श्वास-प्रश्वास दें, कर जीवन निर्वैर।१६।

भवन सेतु पथ से मिले, जीवन में सुख-चैन।
इनकी रक्षा कीजिए, सब मिलकर दिन-रैन।१७।

काँच न तोड़ें भवन के, मत खुरचें दीवार।
याद रखें हैं भवन ही, जीवन के आगार।१८।

भवन न गन्दा हो 'सलिल', सब मिल रखें खयाल।
कचरा तुरत हटाइए, गर दे कोई डाल।१९।

भवनों के चहुँ और हों, ऊँची वृक्ष-कतार।
शुद्ध वायु आरोग्य दे, पायें ख़ुशी अपार।२०।

कंकर से शंकर गढ़े, शिल्प ज्ञान तकनीक।
भवन गगनचुम्बी बनें, गढ़ सुखप्रद नव लीक।२१।

वहीं गढ़ें अट्टालिका जहाँ भूमि मजबूत।
जन-जीवन हो सुरक्षित, खुशियाँ मिलें अकूत।२२।

ऊँचे भवनों में रखें, ऊँचा 'सलिल' चरित्र।
रहें प्रकृति के मित्र बन, जीवन रहे पवित्र।२३।

रूपांकन हो भवन का, प्रकृति के अनुसार।
अनुकूलन हो ताप का, मौसम के अनुसार।२४।


वायु-प्रवाह बना रहे, ऊर्जा पायें प्राण।
भवन-वास्तु शुभ कर सके, मानव को सम्प्राण।२५।

- आचार्य संजीव 'सलिल'

मुक्तकंठ !

शहादतों को भूलकर सियासतों को जी रहे
पड़ोसियों से पिट रहे हैं और होंठ सी रहे
कुर्सियों से प्यार है, न खुद पे ऐतबार है-
नशा निषेध इस तरह कि मैकदे में पी रहे 

जो सच कहा तो घेर-घेर कर रहे हैं वार वो
हद है ढोंग नफरतों को कह रहे हैं प्यार वो
सरहदों पे सर कटे हैं, संसदों में बैठकर-
एक-दूसरे को कोस, हो रहे निसार वो 

मुफ़्त भीख लीजिए, न रोजगार माँगिए
कामचोरी सीख, ख्वाब अलगनी पे टाँगिए
फर्ज़ भूल, सिर्फ हक की बात याद कीजिए-
आ रहे चुनाव देख, नींद में भी जागिए

और का सही गलत है, अपना झूठ सत्य है
दंभ-द्वेष-दर्प साध, कह रहे सुकृत्य है
शब्द है निशब्द देख भेद कथ्य-कर्म का-
वार वीर पर अनेक कायरों का कृत्य है 

प्रमाणपत्र गैर दे: योग्य या अयोग्य हम?
गर्व इसलिए कि गैर भोगता, सुभोग्य हम
जो न हाँ में हाँ कहे, लांछनों से लाद दें -
शिष्ट तज, अशिष्ट चाह, लाइलाज रोग्य हम 

गंद घोल गंग में तन के मुस्कुराइए
अनीति करें स्वयं दोष प्रकृति पर लगाइए
जंगलों के, पर्वतों के नाश को विकास मान-
सन्निकट विनाश आप जान-बूझ लाइए 

स्वतंत्रता है, आँख मूँद संयमों को छोड़ दें
नियम बनायें और खुद नियम झिंझोड़-तोड़ दें
लोक-मत ही लोकतंत्र में अमान्य हो गया-
सियासतों से बूँद-बूँद सत्य की निचोड़ दें 

हर जिला प्रदेश हो, राग यह अलापिए
भाई-भाई से भिड़े, पद पे जा विराजिए
जो स्वदेशी नष्ट हो, जो विदेशी फल सके-
आम राय तज, अमेरिका का मुँह निहारिए 

धर्महीनता की राह, अल्पसंख्यकों की चाह
अयोग्य को वरीयता, योग्य करे आत्म-दाह
आँख मूँद, तुला थाम, न्याय तौल बाँटिए-
बहुमतों को मिल सके नहीं कहीं तनिक पनाह 

नाम लोकतंत्र, काम लोभतंत्र कर रहा
तंत्र गला घोंट लोक का विहँस-मचल रहा
प्रजातंत्र की प्रजा है पीठ, तंत्र है छुरा-
राम हो हराम, तज विराम दाल दल रहा 

तंत्र थाम गन न गण की बात तनिक मानता
स्वर विरोध का उठे तो लाठियां है भांजता
राजनीति दलदली जमीन कीचड़ी मलिन-
लोक जन प्रजा नहीं दलों का हित ही साधता 

धरें न चादरों को ज्यों का त्यों करेंगे साफ़ अब
बहुत करी विसंगति करें न और माफ़ अब
दल नहीं, सुपात्र ही चुनाव लड़ सकें अगर-
पाक-साफ़ हो सके सियासती हिसाब तब 

लाभ कोई ना मिले तो स्वार्थ भाग जाएगा
देश-प्रेम भाव लुप्त-सुप्त जाग जाएगा
देस-भेस एक आम आदमी सा तंत्र का-
हो तो नागरिक न सिर्फ तालियाँ बजाएगा 

धर्महीनता न साध्य, धर्म हर समान हो
समान अवसरों के संग, योग्यता का मान हो
तोडिये न वाद्य को, बेसुरा न गाइए-
नाद ताल रागिनी सुछंद ललित गान हो 

शहीद जो हुए उन्हें सलाम, देश हो प्रथम
तंत्र इस तरह चले की नयन कोई हो न नम
सर्वदली-राष्ट्रीय हो अगर सरकार अब
सुनहरा हो भोर, तब ही मिट सके तमाम तम 

- आचार्य संजीव 'सलिल'

इस आभासी जग में !

इस आभासी जग में सचमुच, कोई न पहरेदार
शिक्षित-बुद्धिमान हमलावर, देते कष्ट हजार

जिनसे जानते हैं जीवन में, उन्हें बनायें मित्र
'सलिल' सुरक्षित आप रहेंगे, मलिन न होगा चित्र

भली-भाँति कर जाँच- बाद में, भले मित्र लें जोड़
संख्या अधिक बढ़ाने की प्रिय!, कभी न करिए होड़

नकली खाते बना-बनाकर, छलिए ठगते मीत
प्रोफाइल लें जाँच, यही है, सीधी-सच्ची रीत

पढ़ें पोस्ट खाताधारी की, कितनी-कैसे लेख
लेखक मन की देख सकेंगे, रचनाओं में रेख

नकली चित्र लगाते हैं जो, उनसे रहिए दूर
छल करना ही उनकी फितरत, रही सजग जरूर

खाताधारक के मित्रों को देखें, चुप सायास
वस्त्र-भाव मुद्राओं से भी, होता कुछ आभास 

देह-दर्शनी मोहकतामय, व्याल-जाल जंजाल
दिखें सोचिए इनके पीछे, कैसा है कंकाल?
 

संचित चित्रों-सामग्री को, देख करें अनुमान
जुड़ें-ना जुड़ें आप सकेंगे, उनका सच पहचान

शिक्षा, स्वजन, जीविका पर भी, तनिक दीजिए ध्यान 
चिंतन धरा से भी होता, चिन्तक का अनुमान 


नेता अभिनेता फूलों या, प्रभु के चिपका चित्र
जो परदे में छिपे- न उसका, विश्वसनीय चरित्र 


स्वजनों के प्रोफाइल देखें, सच्चे या अनमेल?
गलत जानकारी देकर, कर सके न कोई खेल 


शब्द और भाषा भी करते, गुपचुप कुछ संकेत
देवमूर्ति से तन में मन का, स्वामी कहीं न प्रेत

आक्रामक-अपशब्दों का जो, करते 'सलिल' प्रयोग 
दूर रहें ऐसे लोगों से- हैं समाज के रोग

पासवर्ड हो गुप्त- बदलते रहिए बारम्बार
जान न पाए अन्य, सावधानी की है दरकार


- आचार्य संजीव 'सलिल'

साँच को आँच नहीं !

जो बात झूठ है वो बार-बार कहनी पड़ती है। दोहरानी पड़ती है। क्योंकि किसी को यक़ीन नहीं होता। हत्यारा बार-बार कहता है- मैंने ख़ून नहीं किया। प्रेमी बार-बार कहता है- आई लव यू! झूठ है। इसीलिए बार-बार कहना पड़ता है। प्रेमिका को भरोसा दिलाना पड़ता है -सच में करता हूँ प्यार! सोचिए अगर आप रोज़ सुबह-शाम सड़कों पर खड़े होकर चिल्लाएं कि सूरज गरम है। लोग पागल समझेंगे। जो बात सत्य उसे किसी प्रमाण किसी गवाही की ज़रूरत नहीं। वो सूर्य के समान सबके सामने स्पष्ट है। ईश्वर के साथ भी यही है। बार-बार कहना पड़ता है। ईश्वर है! और एक ही ईश्वर है। फिर भी कोई नहीं मानता। सर सब हिलाते हैं कि एक ही है। पर भीतर संशय-शंका से भरा पड़ा है। क्योंकि कभी देखा नहीं, कभी मिले नहीं, कोई पहचान नहीं। किसी महात्मा ने कहा- हमने मान लिया। पर जाना नहीं। ईश्वर को जानने का समय किसके पास है? संसार और शरीर हमें इतना उलझाए रखता है कि भीतर झांकने की फ़ुर्सत ही नहीं।

- ओम्

Sunday, September 1, 2013

मां को कैसा लगता होगा ?


सारे दुःख भूली होगी
देख अपने लाल का मुंह ।

मां को कैसा लगता होगा?
बढ़ते हुए बच्चों को देख
हर सपने पूरी करने को
होगी तत्पर मिट जाने को।

मां को कैसा लगता होगा?
बच्चे हुए होंगे जब बड़े
और सफल हो जीवन में
नाम कमाएं होंगे ख़ूब ।

मां को कैसा लगता होगा?
बच्चे समझ कर उनको बोझ
गिनने लगे निवाले रोज़
देते होंगे ताने रोज़।

मां को कैसा लगता होगा?
करके याद बातें पुरानी
देने को सारे सुख उनको
पहनी फटा और पी पानी।

मां को कैसा लगता होगा?
होगी जब जाने की बारी
चाहा होगा पी ले थोड़ा
बच्चों के हाथों से पानी।

मां को कैसा लगता होगा?
जा बसने में बच्चों से दूर
टकटकी बांधें देखती होगी
उसी प्यार से भरपूर।

मां को कैसा लगता होगा?
मां को कैसा लगता होगा?

अपराध और दंडहीनता !

हिंद-युग्म के मार्च माह के यूनिकवि दर्पण साह की कविताओं से गुजरना अपने समय की युवा चेतना की आत्मसंशय की वीथियों से गुजरने जैसा है। उनकी कविताएं आशावाद के सतही काव्यमय आश्वासन देने की बजाय अपने युग के कड़वे सच से साक्षात्कार करते हुए व्यथित करती हैं। उनकी कविताओं को पढ़ते हुए पाठक को प्रथमदृष्ट्या कविता मे उपस्थित वैचारिक नैराश्य और आत्मवंचना असहज लग सकती है। मगर ध्यान से पढने पर हम देखते हैं कि कविता मे किसी एक मनुष्य का व्यक्तिगत दुःख नही वरन्‌ स्वप्नभंग से पीडित पूरी पीढ़ी की व्यथा प्रतिध्वनित होती है। यह समय वैसे भी मोहभंग का समय है। बाजारवाद के बढ़ते हमले के बीच धनवान और निर्धन के बीच की बढती खाई और भ्रष्टाचार का अंतहीन उत्कर्ष हमारी सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था की विफलता की कहानी ही कह रहे हैं। समय की इन विद्रूपताओं को कविताबद्ध करते हुए दर्पण हमारे आत्ममुग्धता के आवरण को उघाडने की कोशिश करते हुए आत्मसाक्षात्कार का कड़वा आइना हमारे सामने रखने का प्रयास करते हैं। उनकी कविताएं समस्याओं का कोई आदर्शोन्मुख हल नही सुझाती बल्कि समस्याओं को उनके असली चेहरे मे हमे दिखाती हैं। वे कविताओं मे मौजूद हकीकत की तल्खी को आत्मव्यंग्य से संतुलित करने की कोशिश करते हैं। अपने निजी भाषिक विन्यास को परिपक्व करते हुए वो कविता मे शब्दों के इतर प्रतीकों का भी सावधानी से इस्तेमाल करते हैं। पिछली प्रकाशित कविता ’लोकतंत्र बहरहाल’ के बाद प्रस्तुत है उनकी निम्न कविता।


मुझे विश्वास है,
एक दिन हमारे सभी अपराध क्षम्य होंगे,
अपराधों की बढ़ती गहनता के कारण,
और ऐसा,
किसी बड़ी लकीर के खींच दिए जाने सरीखा होगा.
हमारे द्वारा किये गए सामूहिक नरसंहार...
क्षम्य होंगे !
किसी 'फ्रेशर' के ए. सी. रूम में लिए गए,
'ब्रेन-स्टोर्मिंग' इंटरव्यू से तुलनात्मक अध्ययन के बाद.
निश्चित ही,
'उफनते उत्साह' के उन कुछ सालों में,
पूरी एक पीढ़ी को,
घेर-घेर के हतोत्साहित किया जाना
सबसे बड़ा पाप है,
नरसंहार 'साली' क्या चीज़ है !

क़यामत के समय...
बख्श दिए जायेंगे हमारे 'डकैती' और 'चोरी' के
सभी सफल/असफल प्रयास.
क्यूंकि ईश्वर व्यस्त होगा...
...कुछ उससे आवश्यक,
बहुत आवश्यक निर्णयों को 'एग्ज़ीक्यूट' करने में.
मसलन...
'पादरियों', 'पंडितों' और 'शेखों' को...
...जलती कढ़ाई में झोंक देने का निर्णय.
मसलन...
'राजनेताओं', 'वैज्ञानिकों' और 'अर्थशास्त्रियों'
को उल्टा लटका देने का निर्णय.
'न्यायधीशों' को...
..ख़ैर छोड़िये !
और ज़ाम का दौर शुरू करिए...
क्यूंकि मैं जानता हूँ,
हम  सारे 'नशेडियों' को तो
बस एक ही 'दंड' में नाप दिया जाएगा.
दंड बस दस कोड़ों का...
..या बहुत से बहुत बीस !


ब्लॉग  हिन्द-युग्म से साभार.........

Friday, August 23, 2013

जुड़ाव !

जानता हूँ
तोड़ने से ज्यादा कठिन है
जोड़ना
कोशिश भी करता हूँ
कि भरसक मुझसे
कुछ टूटने न पाए
लेकिन टूटना नियति है
जैसे पेड़ से टूटते हैं पके फल और सूखी पत्तियाँ
जैसे गरीब के सपने टूटते हैं
तुम्हारे बाल टूटते हैं
जैसे दुनिया की फरेबी बातों से
टूटते हैं मासूमों के दिल
हाँ तसल्लीबख्श होकर कह सकता हूँ
कि इनमें से
किसी भी टूट से मेरा सरोकार नहीं
पर यह तसल्ली
तोड़ जाती है वह भरोसा जो तुमने मुझ पर जताया था
और मैं जुड़ जाता हूँ
टूटे हुयों की ज़मात में !


-अनिरुद्ध "अनजान"

दीपावली !

दीयों की जगमग से चौंधिया जाए जब  आँगन मेरा
हंस कर बोले प्रतीक्षारत मैं कब से सूना
रंग रंगोली, दीप दीवाली
हर कोने की सुध बुध ले ले

एक दिया हो या हो लाखों  की हो   झिलमिल
राह तकती  घर की देहरी बोले  मैं कब से यहीं
लीपी पुती सफेदी की चादर
लक्ष्मी पाँव निहारूं  एकटक

लड़ियों की माला पहने मुंडेर ने झाँक कर नीचे देखा
इतराती देहरी,मतवाले आँगन  से बोला
ऊपर भी मुझे निहारो
जगमग ,मगन  आज   सूनी माँग  !

चारों दिशाओं में  फैले ज्योति ,पथ  हो जाएँ आलोकित
हर घर ,हर ह्रदय  में हो ऐसा उजियारा
निराश आँखों में  चमक
हताश सांसों में आशा
शुभ दीपावली  की अभिलाषा !     


- पूनम मिश्रा 
ब्लॉग  फलसफ़े (http://poonammisra.blogspot.in/) से साभार.....

लाउडस्पीकर लगाये के मुल्ला देत अज़ान !











लाउडस्पीकर  लगाये  के मुल्ला देत  अज़ान  , चिंतन  में बाधा  पड़े  अल्लाह  है परेशान  !
करें  जागरण  माता  का डी.जे. तेज  बजा , मैय्या मंडप आई हैं ऊँगली कान लगा !
पर्यटन स्थल बन गए सारे तीरथ धाम     , मुक्ति स्थल पर भला क्या हनीमून का काम   ?
नेता अपना  हो गया चौबीस   कैरेट  सच्चा , खुद तो सच्चा देशभक्त जनता कुत्ते का बच्चा !
खरीदारी करते फिरें माह आया रमज़ान  , रोज़े रखकर क्या करे जब अल्लाह में ना ध्यान  ?
शिखा  कौशिक  'नूतन  '

ब्लॉग  विचारों का चबूतरा (http://vicharonkachabootra.blogspot.in/) से साभार .....

Friday, March 15, 2013

कविता बुनना !


मेरी बहने कुछ उलटे कुछ सीधे शब्दों से
कविता बुनना नहीं जानती
वह बुनती हैं हर सर्दी के पहले स्नेह का स्वेटर
खून के रिश्ते और वह ऊन का स्वेटर
कुछ उलटे फंदे से कुछ सीधे फंदे से
शब्द के धंधे से दूर स्नेह के संकेत समझो तो
जानते हो तो बताना बरना चुप रहना और गुनगुनाना
प्रणय की आश से उपजी आहटों को मत कहो कविता
बुना जाता तो स्वेटर है, गुनी जाती ही कविता है
कुछ उलटे कुछ सीधे शब्दों से कविता जो बुनते हैं
वह कविताए दिखती है उधड़ी उधड़ी सी
कविता शब्दों का जाल नहीं
कविता दिल का आलाप नहीं
कविता को करुणा का क्रन्दन मत कह देना
कविता को शब्दों का अनुबंधन भी मत कहना
कविता शब्दों में ढला अक्श है आह्ट का
कविता चिंगारी सी, अंगारों का आगाज़ किया करती है
कविता सरिता में दीप बहाते गीतों सी
कविता कोलाहल में शांत पड़े संगीतों सी
कविता हाँफते शब्दों की कुछ साँसें हैं
कविता बूढ़े सपनो की शेष बची कुछ आशें हैं
कविता सहमी सी बहन खड़ी दालानों में
कविता बहकी सी तरूणाई
कविता चहकी सी चिड़िया, महकी सी एक कली
पर रुक जाओ अब गला बैठता जाता है यह गा-गा कर
संकेतों को शब्दों में गढ़ने वालो
अंगारों के फूल सवालों की सूली
जब पूछेगी तुमसे--- शब्दों को बुनने को कविता क्यों कहते हो ?
तुम सोचोगे चुप हो जाओगे
इस बसंत में जंगल को भी चिंता है
नागफनी में फूल खिले हैं शब्दों से
शायद कविता उसको भी कहते हैं
 
राजीव चतुर्वेदी

गीत !

धुंधली पड़ गईं भित्तिचित्र की लकीरें,
फिर भी, वह छुअन वही है!

एक परस वीणा के तारों को
सहलाकर भरता झंकार!
दूसरा मिटाता है, तटवर्ती
बना हुआ पूरा संसार !

बर्फीली जकड़न से कसी हुई जंजीरें,
फिर भी, वह तपन वही है!

संज्ञाएँ सर्वनाम अर्थहीन
संयोजित वाक्य गया टूट !
अनकही कहानी का दंश महज,
रहा और रह गया अटूट !

घाटी के पार कहीं गूँज रहीं मंजीरें-
थपक वही,गमक वही,चुभन वही है!!

रविकेश मिश्र, बगहा ।

तेरी टेर !


तू मिला भी कब !
तू कहाँ मिला !
कभी नहीं मिला ..!

तू नही मिला...
तब हुआ गिला ..
तन जला मेरा..

मन चला मेरा ..
फिर ....मनचला ..
और उठा धुँआ..
बिन आग नहीं..
गाने लगा
कोई राग नहीं..

नहीं कोई जिरह..
बस बिरह बिरह..
उर किलस किलस
पर गिरह गिरह
कोई खुली नहीं..

कुछ खुला भी जब
तब बचा नही..
बची रही बस
याद तेरी

दिल में जो पला ..
ख्वाब कोई ..
सच में ना ढला .. ...
कभी ख्वाब कोई...
किंतु नही..
कुछ भी खला...

कोई ले ना घेर
अब कर ना देर
होगी अंधेर..
तेरी टेर टेर
मेरा मन बटेर
हर इक मुंडेर
हर इक मुंडेर .....
 
  विवेक मिश्र ( चरस्तु )

अतुकान्त !


ओह मेरे जीवन में पहली बार
मेरे आमूल-चूल का सार ..

मेरी आँखें कौतुक से फैली हैं !
है विस्मय अपार ..

आहट अनाहत की सुन !
लिए पुनर्वास की आस .. .
ज़ेबों में हाथ खोंसे चलता हुआ
अतुकान्त ..
दिशांत के अंत से तुक जोड़. कर
छोड़ दिया तुम्हे सोचना ..
ओ कभी लौट कर ना आने वाले..

और सदाशिव के दिखाए रास्ते पर ..
परिवर्तन हेतु परित्यक्त का
यह अकिंचन प्रयास..
मानो ग्राह्य हुआ..
अनायास..
खुल गया एक तिलस्म
बिना सिम-सिम का..
खुल जा सिम-सिम
खुल जा सिम-सिम ..
कदरन बढ़ गया है
अली बाबा का
सिमटा अंतर्मन !!
और चालीस चोर सारे
पकड़े गये रंगे हाथों ..
अब ..
मेरी आँखें देख सकती हैं
स्वयं को हाथों से
पैरों के छाप गढ़ता हुआ ..

कितने रास्ते मैने अनचले छोड़े ...
मेरी आँखें कौतुक से फैली हैं ..
  विवेक मिश्र (चरस्तु)

Thursday, February 21, 2013

निवाला !


जीवन-बाला ने कल रात
सपने का एक निवाला तोड़ा
जाने यह खबर किस तरह
आसमान के कानों तक जा पहुँची

बड़े पंखों ने यह ख़बर सुनी
लंबी चोंचों ने यह ख़बर सुनी
तेज़ ज़बानों ने यह ख़बर सुनी
तीखे नाखूनों ने यह खबर सुनी

इस निवाले का बदन नंगा,
खुशबू की ओढ़नी फटी हुई
मन की ओट नहीं मिली
तन की ओट नहीं मिली

एक झपट्टे में निवाला छिन गया,
दोनों हाथ ज़ख्मी हो गये
गालों पर ख़राशें आयीं
होंटों पर नाखूनों के निशान

मुँह में निवालों की जगह
निवाले की बाते रह गयीं
और आसमान में काली रातें
चीलों की तरह उड़ने लगीं…

अमृता प्रितम
 

एक मुलाकात !

मैं चुप शान्त और अडोल खड़ी थी

सिर्फ पास बहते समुन्द्र में तूफान था……फिर समुन्द्र को खुदा जाने
क्या ख्याल आया
उसने तूफान की एक पोटली सी बांधी
मेरे हाथों में थमाई
और हंस कर कुछ दूर हो गया

हैरान थी….
पर उसका चमत्कार ले लिया
पता था कि इस प्रकार की घटना
कभी सदियों में होती है…..

लाखों ख्याल आये
माथे में झिलमिलाये

पर खड़ी रह गयी कि उसको उठा कर
अब अपने शहर में कैसे जाऊंगी?

मेरे शहर की हर गली संकरी
मेरे शहर की हर छत नीची
मेरे शहर की हर दीवार चुगली

सोचा कि अगर तू कहीं मिले
तो समुन्द्र की तरह
इसे छाती पर रख कर
हम दो किनारों की तरह हंस सकते थे

और नीची छतों
और संकरी गलियों
के शहर में बस सकते थे….

पर सारी दोपहर तुझे ढूंढते बीती
और अपनी आग का मैंने
आप ही घूंट पिया

मैं अकेला किनारा
किनारे को गिरा दिया
और जब दिन ढलने को था
समुन्द्र का तूफान
समुन्द्र को लौटा दिया….

अब रात घिरने लगी तो तूं मिला है
तूं भी उदास, चुप, शान्त और अडोल
मैं भी उदास, चुप, शान्त और अडोल
सिर्फ- दूर बहते समुन्द्र में तूफान है…..

अमृता प्रितम

आपकी नाकामयाबी !


नन्हा बच्चा
जिस भी उंगली को पकड़े
कस लेता है,
और
अपनी पकड़ की
मज़बूती का
रस लेता है।

आप कोशिश करिए
अपनी उंगली छुड़ाने की।
नहीं छुड़ा पाए न !

वो आपकी नाकामयाबी पर
हंस लेता है।

और पकड़ की
मज़बूती का
भरपूर रस लेता है।

अशोक चक्रधर

ग़जल !

सब आने वाले बहला कर चले गये
आँखो पर शीशे चमका कर चले गये

मलबे के नीचे आकर मालूम हुआ
सब कैसे दिवार गिराकर चले गये

लोग कभी लौटेंगे राख बटोरेंगे
जंगल मे जो आग लगा कर चले गये

गारे, चूने पत्थर के दुश्मन देखो
आहन की दीवार बना कर चले गये

दीवारे, दीवारो की जानिब सरकी
छ्त से बिस्तर लोग उठा कर चले गये॥ 


- बशीर बद्र

******मौन******


तुम्हारा मौन
कितना कोलाहल भरा था
लगा था
कहीं बादलों की गर्जन के साथ
बिलजी न तडक उठे
तुम्हारे मौन का गर्जन
शायद समुद्र के रौरव से भी
अधिक भयंकर रहा होगा
और उस में निरंतर
उठी होंगी उत्ताल तरंगें ,
तुम्हारे मौन में उठते ही रहे होंगे
भयंकर भूकम्प
जिन से हिल गया होगा
पृथ्वी से भी बड़ा तुम्हारा हृदय
इसी लिए मैं कहता हूँ कि
तुम अपना मौन तोड़ दो
और बह जाने दो
अपने प्रेम की अजस्र धारा
भागीरथी सी पवित्र व शीतल
दुग्ध सी धवल
ज्योत्स्ना सी स्निग्ध व सुंदर
और अमृत सी अनुपम॥

डा. वेद व्यतिथ

मै उड़ न सका !


रुकना साँस लेना मेरी ज़रूरत थी
जब भी मै रुका
दुनिया ने कह दिया मै पीछें रह गया
मै चलने के लिए बना था
वो कहते रहे मै उड़ न सका

विचार बीज थे
मै मिट्टी था
दुनिया से अलग सोचता
मै मिट्टी था
बारिश की बूदों पड़े तो मै खुशबू
सूरज की रोशनी में जादू
की विचारों में जिंदगी भर दू
उपजाऊ था
पर था तो मै मिट्टी ही
कइयो ने समझाया
सोना होना ज़रुरी है
मिट्टी का नहीं है मोल
सोना है अनमोल
मुझे खलिहानोँ में होना था
बारिश धुप में भिगोना था
पर भट्टी में जलाया गया मुझे
की लोगो की चाह में सोना था
पर मै मिट्टी था
मुझे मिट्टी ही होना था
मै चलने के लिए बना था
मै उड़ न सका

क्या सोना होना इतना ज़रुरी है
क्या सोना फसल बनेगा
क्या सोना पेट भरेगा
क्या सोना आस्मा से बरसेगा
और बीजो में जीवन भरेगा
सोना कीमती है
पर मै भी हू अनमोल
पर मुझे इतना तपाया गया
की मै मिट्टी भी न रह सका
विचार मेरे जल गए
नसों में लड़ने की कूबत थी
सब भाप बन निकल गए
मै चलने के लिए बना था
मै उड़ न सका

सासे लेना धडकना
दुनिया के रंग रंगना चहकना
ये मेरी ताकत थी
पर उसे समझ ना आया
जब भी तोला मुझे
उसने सोने के सिक्को से
हमेशा कम पाया
मै चलने के लिए बना था
मै उड़ न सका

 
शशिप्रकाश सैनी 

http://www.kavishashi.com/2011/12/blog-post_26.html#.UgmvcNIwcWY 

हिचकी !

हिचकी बीमारी है
या कोई याद
याद
पहाड़ के पत्थर पर
चुपचाप सिकुड़ी बैठी है
या मछुआरों के जाल से बचती
गहरे समुन्दरों में जा डूबी है ।

अष्टभुजाओं वाले आक्टोपस के
हाथ भी नहीं आ रही ,
नमकीन पानी में
घुल रही है याद ..

याद हिचकी लेकर आई है ।


- नीरू असीम (पंजाबी से अनुवादित)

अजीज आज़ाद की कवितायेँ !

१.

मैं तो बस ख़ाके-वतन हूँ गुलो-गौहर तो नहीं
मेरे ज़र्रों की चमक भी कोई कमतर तो नहीं

मैं ही मीरा का भजन हूँ मैं ही ग़ालिब की ग़ज़ल
कोई वहशत कोई नफ़रत मेरे अन्दर तो नहीं

मेरी आग़ोश तो हर गुल का चमन है लोगों
मैं किसी एक की जागीर कोई घर तो नहीं

मैं हूँ पैग़ाम-ए-मुहब्बत मेरी सरहद ही कहाँ
मैं किसी सिम्त चला जाऊं मुझे डर तो नहीं

गर वतन छोड़ के जाना है मुझे लेके चलो
होगा अहसास के परदेस में बेघर तो नहीं

मेरी आग़ोश तो तहज़ीब मरकज़ है 'अज़ीज़'
कोई तोहमत कोई इल्ज़ाम मेरे सर तो नहीं !


२.

ज़मीं है हमारी न ये आसमाँ है
जहाँ में हमारा बसेरा कहाँ है

ये कैसा मकाँ है हमारे सफ़र का
कोई रास्ता है न कोई निशाँ है

अभी हर तरफ़ है तसादुम की सूरत
सुकूँ ज़िन्दगी का यहाँ न वहाँ है

कभी हँसते-हँसते छलक आए आँसू
निगाहों के आगे धुआँ ही धुआँ है

शराफ़त को उजड़े मकानों में ढूँढो
शहरों में इसका ठिकाना कहाँ है

चलो फिर करेंगे उसूलों की बातें
अभी तो हमें इतनी फ़ुरसत कहाँ है !


३.

तुम ज़रा प्यार की राहों से गुज़र कर देखो
अपने ज़ीनो से सड़क पर भी उतर कर देखो

धूप सूरज की भी लगती है दुआओं की तरह
अपने मुर्दार ज़मीरों से उबर कर देखो

तुम हो खंज़र भी तो सीने में समा लेंगे तुम्हें
प' ज़रा प्यार से बाँहों में तो आ कर देखो

मेरी हालत से तो ग़ुरबत का गुमाँ हो शायद
दिल की गहराई में थोड़ा-सा उतर कर देखो

मेरा दावा है कि सब ज़हर उतर जायेगा
तुम मेरे शहर में दो दिन तो ठहर कर देखो

इसकी मिट्टी में मुहब्बत की महक आती है
चाँदनी रात में दो पल तो पसर कर देखो

कौन कहता है कि तुम प्यार के क़ाबिल ही नहीं
अपने अन्दर से भी थोड़ा सा संवर कर देखो !
 

सपनों के लिए !


एक-एक कर
उधड़ गए
वे सारे सपने
जिन्हें बुना था
अपने ही खयालों में
मान कर अपने !

सपनों के लिए
चाहिए थी रात
हम ने देख डाले
खुली आंख
दिन में सपने
किया नहीं
हम ने इंतजार
सपनों वाली रात का
इस लिए
हमारे सपनों का
एक सिरा
रह जाता था
कभी रात के
कभी दिन के हाथ में
जिस का भी
चल गया जोर
वही उधेड़ता रहा
हमारे सपने !

अब तो
कतराने लगे हैं
झपकती आंख
और
सपनों की उधेड़बुन से !

ओम पुरोहित "कागद"

अमृता प्रीतम की रचनाएँ !

१. 

आज हमने एक दुनिया बेची
और एक दीन ख़रीद लिया
हमने कुफ़्र की बात की

सपनों का एक थान बुना था
एक गज़ कपड़ा फाड़ लिया
और उम्र की चोली सी ली

आज हमने आसमान के घड़े से
बादल का एक ढकना उतारा
और एक घूँट चाँदनी पी ली

यह जो एक घड़ी हमने
मौत से उधार ली है
गीतों से इसका दाम चुका देंगे ! 


२.

सिर्फ़ दो रजवाड़े थे –
एक ने मुझे और उसे
बेदखल किया था
और दूसरे को
हम दोनों ने त्याग दिया था।

नग्न आकाश के नीचे –
मैं कितनी ही देर –
तन के मेंह में भीगती रही,
वह कितनी ही देर
तन के मेंह में गलता रहा।

फिर बरसों के मोह को
एक ज़हर की तरह पीकर
उसने काँपते हाथों से
मेरा हाथ पकड़ा!
चल! क्षणों के सिर पर
एक छत डालें
वह देख! परे – सामने उधर
सच और झूठ के बीच –
कुछ ख़ाली जगह है…!!  

यातनाएं !


बदला कुछ भी नहीं
यह देह उसी तरह दर्द का कुआं है।
इसे खाना, सांस लेना और सोना होता है।
इस पर होती है महीन त्वचा
जिसके नीचे ख़ून दौड़्ता रहता है।
इसके दांत और नाख़ून होते हैं।
इसकी हड्डियां होती हैं जिन्हें तोड़ा जा सकता है।
जोड़ होते हैं जिन्हें खींचा जा सकता है।

बदला कुछ भी नहीं।
देह आज भी कांपती है उसी तरह
जैसे कांपती थी
रोम के बसने के पूर्व और पश्चात्।
ईसा के बीस सदी पूर्व और पश्चात्
यातनाएं वही-की-वही हैं
सिर्फ़ धरती सिकुड़ गई है
कहीं भी कुछ होता है
तो लगता है हमारे पड़ोस में हुआ है।

बदला कुछ भी नहीं।
केवल आबादी बढ़ती गई है।
गुनाहों के फेहरिस्त में कुछ और गुनाह जुड़ गए हैं
सच्चे, झूठे, फौरी और फर्जी।
लेकिन उनके जवाब में देह से उठती हुई चीख
हमेशा से बेगुनाह थी, है और रहेगी।

बदला कुछ भी नहीं
सिवाय तौर-तरीकों, तीज-त्यौहारों और नृत्य-समारोहों के।
अलबत्ता मार खाते हुए सिर के बचाव में उठे हुए हाथ की मुद्रा वही रही।
शरीर को जब भी मारा-पीटा, धकेला-घसीटा
और ठुकराया जाता है,
वह आज भी उसी तरह तड़पता ऐंठता
और लहूलुहान हो जाता है।

बदला कुछ भी नहीं
सिवाय नदियों, घाटियों, रेगिस्तानों
और हिमशिलाओं के आकारों के।
हमारी छोटी-सी आत्मा दर-दर भटकती फिरती है।
खो जाती है, लौट आती है।
क़्ररीब होती है और दूर निकल जाती है
अपने आप से अजनबी होती हुई।
अपने अस्तित्व को कभी स्वीकारती और कभी नकारती हुई।
जब कि देह बेचारी नहीं जानती
कि जाए तो कहां जाए।

विस्सावा शिंबोर्स्का (अनुवाद: विजय अहलूवालिय)

जय हिन्द.........

है समय नदी की बाढ़ कि जिसमें सब बह जाया करते हैं।
है समय बड़ा तूफ़ान प्रबल पर्वत झुक जाया करते हैं ।।
अक्सर दुनियाँ के लोग समय में चक्कर खाया करते हैं।
लेकिन कुछ ऐसे होते हैं, इतिहास बनाया करते हैं ।।

यह उसी वीर इतिहास-पुरुष की अनुपम अमर कहानी है।
जो रक्त कणों से लिखी गई,जिसकी जयहिन्द निशानी है।।
प्यारा सुभाष, नेता सुभाष, भारत भू का उजियारा था ।
पैदा होते ही गणिकों ने जिसका भविष्य लिख डाला था।।

यह वीर चक्रवर्ती होगा , या त्यागी होगा सन्यासी।
जिसके गौरव को याद रखेंगे, युग-युग तक भारतवासी।।
सो वही वीर नौकरशाही ने,पकड़ जेल में डाला था ।
पर क्रुद्ध केहरी कभी नहीं फंदे में टिकने वाला था।।

बाँधे जाते इंसान,कभी तूफ़ान न बाँधे जाते हैं।
काया ज़रूर बाँधी जाती,बाँधे न इरादे जाते हैं।।
वह दृढ़-प्रतिज्ञ सेनानी था,जो मौका पाकर निकल गया।
वह पारा था अंग्रेज़ों की मुट्ठी में आकर फिसल गया।।

जिस तरह धूर्त दुर्योधन से,बचकर यदुनन्दन आए थे।
जिस तरह शिवाजी ने मुग़लों के,पहरेदार छकाए थे ।।
बस उसी तरह यह तोड़ पींजरा , तोते-सा बेदाग़ गया।
जनवरी माह सन् इकतालिस,मच गया शोर वह भाग गया।।

वे कहाँ गए, वे कहाँ रहे,ये धूमिल अभी कहानी है।
हमने तो उसकी नयी कथा,आज़ाद फ़ौज से जानी है।।

-- गोपालदास व्यास

स्‍वतंत्र भावना का स्‍वतंत्र गान !


घोर अंधकार हो, चल रही बयार हो,
आज द्वार द्वार पर यह दिया बुझे नहीं।

यह निशीथ का दिया ला रहा विहान है।
शक्ति का दिया हुआ, शक्ति को दिया हुआ,
भक्ति से दिया हुआ, यह स्‍वतंत्रता दिया,
रुक रही न नाव हो, जोर का बहाव हो,
आज गंगधार पर यह दिया बुझे नहीं!

यह स्‍वदेश का दिया हुआ प्राण के समान है!
यह अतीत कल्‍पना, यह विनीत प्रार्थना,
यह पुनीत भवना, यह अनंत साधना,
शांति हो, अशांति हो, युद्ध, संधि, क्रांति हो,
तीर पर, कछार पर, यह दिया बुझे नहीं!

देश पर, समाज पर, ज्‍योति का वितान है!
तीन चार फूल है, आस पास धूल है,
बाँस है, फूल है, घास के दुकूल है,
वायु भी हिलोर से, फूँक दे, झकोर दे,
कब्र पर, मजार पर, यह दिया बुझे नहीं!

यह किसी शहीद का पुण्‍य प्राणदान है!
झूम झूम बदलियाँ, चुम चुम बिजलियाँ
आँधियाँ उठा रही, हलचले मचा रही!
लड़ रहा स्‍वदेश हो, शांति का न लेश हो
क्षुद्र जीत हार पर, यह दिया बुझे नहीं!

यह स्‍वतंत्र भावना का स्‍वतंत्र गान है!

 
गोपाल सिंह नेपाली

दुष्यंत कुमार की कवितायें !

१.
आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,
पर अँधेरा देख तू आकाश के तारे न देख।

एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ,
आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख।

अब यकीनन ठोस है धरती हकीकत की तरह,
यह हकीकत देख लेकिन खौफ के मारे न देख।

वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे,
कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख।

ये धुंधलका है नजर का तू महज मायूस है,
रोजनों को देख दीवारों में दीवारें न देख।

राख कितनी राख है, चारों तरफ बिखरी हुई,
राख में चिनगारियाँ ही देख अंगारे न देख।


 २.

ये सच है कि पाँवों ने बहुत कष्ट उठाए
पर पाँवों किसी तरह से राहों पे तो आए

हाथों में अंगारों को लिए सोच रहा था
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए

जैसे किसी बच्चे को खिलोने न मिले हों
फिरता हूँ कई यादों को सीने से लगाए

चट्टानों से पाँवों को बचा कर नहीं चलते
सहमे हुए पाँवों से लिपट जाते हैं साए

यों पहले भी अपना—सा यहाँ कुछ तो नहीं था
अब और नज़ारे हमें लगते हैं पराए॥  


३. चीथड़े में हिन्दुस्तान

एक गुडिया की कई कठपुतलियों में जान है,
आज शायर ये तमाशा देख कर हैरान है।

ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए,
यह हमारे वक्त की सबसे सही पहचान है।

एक बूढा आदमी है मुल्क में या यों कहो,
इस अँधेरी कोठारी में एक रौशनदान है।

मस्लहत-आमेज़ होते हैं सियासत के कदम,
तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है।

इस कदर पाबंदी-ए-मज़हब की सदके आपके
जब से आज़ादी मिली है, मुल्क में रमजान है।

कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,
मैंने पूछा नाम तो बोला की हिन्दुस्तान है।

मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ,
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है।
 

गजल !

' उन्हें क्या खोजना जो घर जलाएं ?
वो अपने घर गए, हम घर बनाएं ।

हकीकत जान जाती है ये दुनिया
मुखौटे आप हम जितने लगाएं !

मैं गजलें पढ रहा, शामेसुखन है
मेरे कातिल से कहिए,सर छुपाएं !

यहीं पर खत्म ये किस्सा नहीं था,
मगर तुम सो गए तो क्या सुनाएं !

उचट जाती है अब भी नींद मेरी
महज कर याद, तेरी वो सदाएं !

अकेले हम चलेंगे राहेमकतल
कोई देखे तो जीने की अदाएं!

ये लम्बी दास्तां है, जिन्दगी-सी
तुम्हें अच्छी लगी तो कल सुनाएं !! 


रविकेश मिश्र

भोजपुरी गीत !

हियरा में उठत हिलोर,पिया हो,
अइसे जनि ताकऽ

लहके अगिन पोरेपोर,पिया हो,
अइसे जनि ताकऽ

छुइ जाला देहिया,अङरि जाला मनवां
छोट लागे घर,छोट लागे असमनवां!

प्रनवा के देला झकझोर,पिया हो,
अइसे जनि ताकऽ!
मनवां में मचत मरोर, धनी तूँ,
धरतिया न ताकऽ!

भूलि जाला बेद,भूलि जाइले पुरनवां!
मोरे अंकवारी नाहीं आंटेला जहनवां!

चनवां के देखेला चकोर, धनी तूँ,
धरतिया न ताकऽ!
रविकेश मिश्र

जहां बरसात में हम तरबतर रहे !


छतों पे पड़ती रही धूप
वो बंद कमरों में हर पहर रहे
कभी हवाओ से जूझें नहीं
जहां बरसात में हम तरबतर रहे
उनके छाते छूटे नहीं
पानी से डरते इस कदर रहे

न चले घास पे चमकती ओस पे
चप्पल उतरे नहीं कही
न पैरों में कभी पर रहे
ख्वाबो को आज़ाद छोडना था
भरने उड़ान असमान की
क्यों फिर ज़मी पर रहे

मेरी सुनता नहीं है वो
दी मुझे जिंदगी नहीं
दुनिया की ली खबर
बस मुझी से क्यों बेखबर रहे
ना आंखे खोली कभी
ना सवेरा देखा
और खुदा पे लगाते रहे इलज़ाम
अंधेरा मेरे घर रहे

शशिप्रकाश सैनी

Saturday, February 16, 2013

ढाई आखर प्रेम के !

आंखें भीगी
पलकों में नमी सी है
न जाने क्यूँ ये लब
हंसी को कम

अश्को को ज्यादा चूमने लगे हैं...
मौन था मन ,ह्रदय निस्पंद
झुके हैं चक्षु ,मंजुकपोल
और वो न जाने क्यूँ
छुपाते रहे सूखे पड़े उन
अधरों की सुर्ख़ियों में

वो ढाई आखर प्रेम के.....
- राहुल त्रिपाठी

मन ये ही चाहता है !

ना जाऊं इस नगरी से ..
मन ये ही चाहता है..
जो जाना हुआ ..
ना रुक पाऊँगी ..
ना रोक पाऊँगी..
उसे तो मिल जाना है सागर में..
बहती धारा को रोका किसने है..
आंसुओं की धारों से गुजरकर..
सारे मोह को त्यागकर ..
जाना तो है..
पर पुरानी चीजों से मोह कहाँ जाता है..
- सुमन पाठक 

Friday, February 1, 2013

ग्लोबलाइजेशन !

खुश होता था कभी
ग्लोबलाइजेशन के नाम से
इसी के तो देखता था
सपने साहित्य में
दुनिया सब एक हो
सबमें हो भाई-चारा
करें सब विकास मिल.
लेकिन मैं ठगा गया
नाम तो वही था पर
छद्म वेश धारण कर
कोई और आ गया.
करता ही जा रहा यह
हत्याएँ गाँवों की
नष्ट कर सब संस्कृतियाँ
अपने ही पैर यह
फैलाए जा रहा
अरे, कोई मारो इसे
यह तो हत्यारा है!
नष्ट करता जा रहा
खेत-खलिहानों और
गाँवों-जवारों को.
सुनता पर कोई नहीं चीख मेरी
शामिल हैं लोग उसके साथ सब
लड़ते हैं गुरिल्ला जो
लैस वे भी दीखते हैं
उसी के हथियारों से.
महँगा सौदा
कारण तो कुछ भी नहीं
खुश है पर आज मन.
बैठता जब सोचने
आता है याद आज
घटी नहीं कोई दुर्घटना
नींद में भी आया नहीं
कोई दुस्वप्न.
जानता हूँ ऐसा तो
था नहीं हमेशा से
घोर अभावों में भी
मिलती थी नींद भरपूर कभी.
दूर अब अभाव सारे कर लिये
सुविधाएँ हासिल सब हो गईं
लेकिन जो पास था सुकून तब
दूर वही हो गया
जाना पड़ता है अब
हँसने को लाफ्टर क्लब
आती नहीं नींद गोलियों से भी
तरक्की तो हो रही है रोज-रोज
तेजी से भागता मैं जा रहा
छूटता ही जा रहा पर
सुख-चैन पीछे.
सोचता हूँ कभी-कभी
सौदा महँगा तो नहीं !


- हेमधर शर्मा

अक्स विहीन आईना !

आज उतार लायी हूँ
अपनी भावनाओं की पोटली
मन की दुछत्ती से
बहुत दिन हुये
जिन्हें बेकार समझ
पोटली बना कर
डाल दिया था
किसी कोने में ,
आज थोड़ी फुर्सत थी
तो खंगाल रही थी ,
कुछ संवेदनाओं का
कूड़ा - कचरा ,
एक तरफ पड़ा था
मोह - माया का जाल ,
इन्हीं  सबमें  खुद को ,
हलकान करती हुई
ज़िंदगी को दुरूह
बनाती जा रही हूँ ।
आज मैंने झाड दिया है
इन सबको
और बटोर कर
फेंक आई हूँ बाहर ,
मेरे  मन का घर
चमक रहा है
आईने की तरह , लेकिन
अब  इस आईने में
कोई अक्स नहीं दिखता ।

- संगीता स्वरुप

(ब्लाग ‘गीत मेरी अनुभूतियाँ’ से साभार)

अंतहीन यात्रा !

जब भी लगता है सब ठीक-ठाक
और नहीं घेरती मन को चिंता
घबरा जाता हूँ अचानक
टटोलता हूँ अपनी सम्वेदनाएँ
कि मरीं तो नहीं वे!
दरअसल समय इतना कठिन है
कि चिंतामुक्त रहना भी अपराध है
मिले हैं मुङो विरासत में
प्रदूषित पृथ्वी और रुग्ण समाज
खूब कमाना और खूब खाना ही है
मेरे समकालीनों का जीवन लक्ष्य
कि त्याग का मतलब अब
तपस्या नहीं पागलपन है
फिर कैसे रह सकता भला मैं चिंतामुक्त!
इसीलिये आता जब
कभी क्षण खुशी का
होता भयभीत भी हूँ साथ ही
कि पथरा तो गईं नहीं सम्वेदनाएँ!
टूटता है बदन और
आँखें भी बोझिल हैं नींद से
फिर भी लिखता कविता
डरता हूँ सोने से
कि नींद अगर रास्ते में आ गई
तो शायद कभी न हो सवेरा ।


- हेमधर शर्मा

प्यार की क्या - पहचान है ?

प्यार की क्या -
पहचान है .
कहाँ मिलता है
क्या कीमत - मोल
क्या भाव .

कोई बतायेगा -
क्या ढूँढने से मिल जाएगा
या फिर लाटरी है -
नम्बर निकल आएगा .

कुछ भी तय नहीं -
सब भाग्याधीन -
मिले भी - और
ना भी मिले .

फिर लोग क्यों कहते
रहते हैं - प्रेम कर
प्रेम पायें -
अरे बाबा - बताओ
कहाँ से रिक्मैंड कराएं
किस सरकारी -
ऑफिस के चक्कर लगाएं . 
- सतीश  शर्मा 

कविता के साथ-साथ !

हो सकता है कि अच्छी न बने कविता
क्योंकि आँखों में नींद और सिर में भरा है दर्द
पर स्थगित नहीं हो सकता लिखना
लिखा था कभी
कि जीवन की लय को पाना ही कविता है
लय तो अभी भी टूटी नहीं
पर सराबोर है यह कष्टों और संघर्षो से
नहीं रोकूँगा अब इन्हें
कविता में आने से.
ओढ़ँगा-बिछाऊँगा
रखूँगा अब साथ-साथ कविता को.
जानता हूँ कठिन है
इजाफा ही करेगी यह
कष्टों-संघर्षो में
लेकिन मंजूर है यह.
साथ रही कविता तो
भयानक लगेगी नहीं मौत भी
कविता के बिना लेकिन
रास नहीं आयेगा जीवन भी.
कठिन विकल्प
गुजरता हूँ जब गहन पीड़ा से
जन्म लेती हैं तभी, महान कविताएँ
इसीलिये नहीं करता मन
भागने का, अब कष्टों से
चुनता हूँ वही विकल्प
जो सर्वाधिक कठिन हो.
हताशा लेकिन होती है
शक्ति के अभाव में जब
चिड़चिड़ा उठता है मन.
होती महसूस तब
प्रार्थना की जरूरत
इसलिये नहीं कि कम हो जायँ दुख-कष्ट
बल्कि शक्ति मिले उन्हें सहने की.
इसीलिये बार-बार
हार कर भी आता उसी जगह पर
चुनता हूँ कठिन विकल्प
स्वेच्छा से दुख-कष्ट.
फीनिक्स पक्षी की तरह
मरता हूँ बार-बार
जीता हूँ फिर-फिर
अपनी ही राख से !


- हेमधर शर्मा 

Thursday, January 24, 2013

चल कहीं दूर चलें !

चल कहीं दूर चलें -
रंजो गम के साए -ना हों
जहाँ अपने-पराये ना हों

इस कदर गुम हो जाएँ -खुद में
किसी अपने -गैर को
ढूँढने पर भी पाए ना हो

पुकारें लोग हमको -
भीड़ में मेले में -
या फिर कहीं
अकेले में- इतने खोये रहें
किसी के हाथ में आयें ना हों

एक छोटा सा घर - अंजलि भर
आस्मां हो -सपनो का सा
अपना जहाँ हो
ना कोई हमदम -ना कोई पासबां हो

तेरे मेरे आलावा किसी-
और की तनिक भी -गुंजाईश ना हो
प्रेम प्यार की जहाँ कोई पैमाइश ना हो

है कोई ऐसी जगह इस जहां में ?
तेरे मेरे एक साथ रहने के लिए -
एक दूसरे की सुनने -कहने के लिए

मंदिर हो घर हो -या
किसी तीसरे का दर हो
मेरी दुनिया में हो -ना हो
तेरे पास मगर हो

पर हो तो सही - जिसे मैं ढूँढता
रहता हूँ यहाँ -वहां हर कहीं.
अपना पता बता -या सीधा मेरे पास
बेझिझक चला आ

सब लोग कह उठें - वाह !
इसे कहते हैं - परम आत्मा
से आत्मा का मिलन
- सतीश शर्मा

मन की दीवार !

वाल का भी बड़ा अह्म अब
पहले तो एक ही वाल थी
चीन की दीवार ..."चाइना वाल "
अब हर एक को हांसिल है
क्या फुद्दू , क्या शोरबा ....

भांति -भातिं की वाल
कुछ शीशे की ,कुछ पत्थर की
कुछ नीची भी कुछ आसमान से ऊँचीं भी
किसी वाल पर ताले अलीगढ़ के जड़े
कोई वाल बस मुक्त जेल सी
एक वाल पर तो लिखा भी था ...
"यहाँ पेशाब करना मना है "
एक पर लिखा कि "इश्तिहार चिपकाना मना है "
एक पर ये भी लिखा था .....
देखो ...."यहाँ गधा मूत रहा है ..."

एक वाल बहुत छोटी सी दिखी ..
अपनी सी ,मैं कूद गया उसपर
बचपन में दीवारें कहाँ रोक पायीं मेरी उमंग
छतों से दूसरी ...फिर तीसरी फिर चौथी भी
अगर गिनू तो पांचवीं और छठवी भी
न जाने कितनी दीवारें फलांगी मैंने

जीने की चाह लिए उतरा भी
न जाने कितने जीनें ..

बहुत बार ऐसा हुआ कि सवाल ये हुआ "अरे तुम ?"
तब शिकायत नहीं होती थी मनों में
वहीँ खाया ,फैलाया और जी भी लिया
अब ऐसी वालें नहीं होती हैं ..

ये अम्बुजा सीमेंट की है वाल
लगाओ कितना भी जोर
नहीं टूटने वाली ..
अब दीवालें मनों में जो खड़ी होती हैं ....
- राघुवेन्द्र अवस्थी 

हरी की पूंजी बहूत है !

मगन भया संसार में - माया चारों ओर
ढूंढत ढूंढत मर गए - मिला ना दूजा छोर
|
साधू को सोहे नहीं - चूल्हा तवा परात
हरी की पूंजी बहूत है - वोही जाएगी साथ
|
सुख का भी क्या भोगना - कहें फकीरी बात
जितना लम्बा दिन भया - उससे लम्बी रात
|
मरना पक्का है मगर , जीने की कर बात
आएगी जब आएगी - फिर क्यों देखे बाट
|
नहीं रहना संसार में - अब क्या सोचो नाथ
बिनती मेरी मान ले - ले चल अपने साथ |
- सतीश शर्मा 

आखिर ये क्यों होता है |

गान्धी से जिन्ना ने जो भी मांगा वो सम्मान दिया |
भारत माता का बटवारा सहकर पाकिस्तान दिया ||
लेकिन चन्द महीनों मे ही तुम औकात दिखा बैठे |
काश्मीर पर हमला करके अपनी जात दिखा बैठे ||
नेहरु गाँधी की एक भूल का ये अन्जाम हुआ देखो |
साँप गले मे पडा हुआ है ये परिणाम हुआ देखो ||
हमने ढाका जीता भारत का झन्डा गङ सकता था |
दर्रा हाजी पीर जीतकर भी भारत अङ सकता था ||
लेकिन हम तो ताशकंद के समझौते मे छले गये |
और हमारे लाल बहादुर इस दुनिया से चले गये ||
पाक धरा से मिट ही जाता मौक़े टाल दिए हमने |
लाखों कैदी भुट्टो की झोली मे डाल दिए हमने ||
हम एटमी ताकत होकर भी भी लाहौर गये बस मे |
हमने शिमला समझौते की कभी नही तोडी कसमे ||
फिर भी बार- बार हमलों से भारत घायल होता है |
मै दिल्ली से पूछ रही हूँ आखिर ये क्यों होता है ||
उत्तर कहीं नही मिलता है शर्मसार हो जाता हूँ |
इसी लिए मै कविता को हथियार बनाकर गाती हूँ ||
 
- सूजाता पाटिल, मुम्बई पुलिस इंस्पेक्टर

माँ का चंदा !

सारी सारी रात बेचैन से -
नन्हे टिमटिम करते तारे
माँ और ममता की तलाश में -
आकाश में मंडराते घूमते हैं .

और सुबह होते होते - किसी
ममता भरी माँ का सूना
आँचल देख - उसमे समां जाते हैं .
बच्चे बन उसके घर आ जाते हैं .
और नन्हे तारे से - बन जाते हैं
उसके लाडले चंदा - सूरज .

हर रात ये खेल - आज भी
अबाध गति से - गुपचुप चलता है .
हर तारा - किसी माँ का
चंदा सूरज बनने -रात को
आकाश में निकलता है .
- सतीश शर्मा 

Friday, January 4, 2013

इनको भी, उनको भी, उनको भी !

तुमसे क्या झगड़ा है
हमने तो रगड़ा है--
इनको भी, उनको भी, उनको भी !

दोस्त है, दुश्मन है
ख़ास है, कामन है
छाँटो भी, मीजो भी, धुनको भी

लँगड़ा सवार क्या
बनना अचार क्या
सनको भी, अकड़ो भी, तुनको भी

चुप-चुप तो मौत है
पीप है, कठौत है
बमको भी, खाँसो भी, खुनको भी

तुमसे क्या झगड़ा है
हमने तो रगड़ा है
इनको भी, उनको भी, उनको भी !

- नागार्जुन
(1978 में रचित)
 

चांद का कुर्ता !

हठ कर बैठा चांद एक दिन, माता से यह बोला
सिलवा दो माँ  मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला

सन सन चलती हवा रात भर जाड़े से मरता हूँ
ठिठुर ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ

आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का
न हो अगर तो ला दो कुर्ता ही को भाड़े का

बच्चे की सुन बात, कहा माता ने ‘अरे सलोने’
कुशल करे भगवान, लगे मत तुझको जादू टोने

जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूँ
एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ

कभी एक अंगुल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा
बड़ा किसी दिन हो जाता है, और किसी दिन छोटा

घटता-बढ़ता रोज, किसी दिन ऐसा भी करता है
नहीं किसी की भी आँखों को दिखलाई पड़ता है

अब तू ही ये बता, नाप तेरी किस रोज लिवायें
सी दूँ  एक झिंगोला जो हर रोज बदन में आये!

- रामधारी सिंह ”दिनकर

Wednesday, January 2, 2013

प्रियतम का पथ आलोकित कर !

मधुर मधुर मेरे दीपक जल !
युग युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल,
प्रियतम का पथ आलोकित कर !

सौरभ फैला विपुल धूप बन,

मृदुल मोम सा घुल रे मृदु तन;
दे प्रकाश का सिन्धु अपरिमित,
तेरे जीवन का अणु अणु गल !
पुलक पुलक मेरे दीपक जल !

सारे शीतल कोमल नूतन
माँग रहे तुझसे ज्वाला-कण
विश्व-शलभ सिर धुन कहता 'मैं
हाय न जल पाया तुझ में मिल' !
सिहर सिहर मेरे दीपक जल !

जलते नभ में देख असंख्यक,
स्नेहहीन नित कितने दीपक;
जलमय सागर का उर जलता,
विद्युत ले घिरता है बादल !
विहँस विहँस मेरे दीपक जल !

द्रुम के अंग हरित कोमलतम,
ज्वाला को करते हृदयंगम;
वसुधा के जड़ अंतर में भी,
बन्दी है तापों की हलचल !
बिखर बिखर मेरे दीपक जल !

मेरी निश्वासों से द्रुततर,
सुभग न तू बुझने का भय कर
मैं अँचल की ओट किये हूँ,
अपनी मृदु पलकों से चंचल !
सहज सहज मेरे दीपक जल !

सीमा ही लघुता का बंधन,
है अनादि तू मत घड़ियाँ गिन;
मैं दृग के अक्षय कोषों से
तुझ में भरती हूँ आँसू जल !
सजल सजल मेरे दीपक जल !

तम असीम तेरा प्रकाश चिर,
खेलेंगे नव खेल निरंतर;
तम के अणु अणु में विद्युत सा
अमिट चित्र अंकित करता चल !
सरल सरल मेरे दीपक जल !

तू जल जल जितना होता क्षय,
वह समीप आता छलनामय;
मधुर मिलन में मिट जाना तू
उसकी उज्ज्वल स्मित में घुल खिल !
मदिर मदिर मेरे दीपक जल !

प्रियतम का पथ आलोकित कर !


- महादेवी वर्मा

Tuesday, January 1, 2013

नव वर्ष के लिए !

कैसी निःशब्दता के साथ अंततः
प्रकट होते हो तुम घाटी में
तुम्हारे सूर्य की पहली रश्मि होती है
अवतरित छूने के लिए कुछ
ऊँचे पत्तों को जिनमें नहीं है कोई हलचल
मानो उन्होंने दिया ही न हो ध्यान
और तुम्हें बिलकुल ही न जानते हों
फिर उठता है एक कबूतर का स्वर
कहीं दूर से स्वयं में मग्न
जो पुकारता है भोर की नीरवता को

तो यह है स्वर तुम्हारे

यहाँ और इस पल होने का
चाहे कोई इसे सुन पाए न सुन पाए
यह है वह स्थान जहाँ हम पहुँच चुके हैं
अपने युग के साथ अपने ज्ञान के साथ
जैसा भी वह है
और अपनी आशाओं के साथ
जैसी भी वे हैं
हमारे सामने अदृश्य
अछूती और अभी भी संभव


-- डब्ल्यू एस मर्विन 


W.S. Merwin डब्ल्यू एस मर्विन ( W S Merwin )अमरीकी कवि हैं व इन दिनों अमरीका के पोएट लॉरीअट भी हैं.उनकी कविताओं, अनुवादों व लेखों के 30 से अधिक संकलन प्रकाशित हो चुके हैं .उन्होंने दूसरी भाषाओँ के प्रमुख कवियों के संकलन, अंग्रेजी में खूब अनूदित किये हैं, व अपनी कविताओं का भी स्वयं ही दूसरी भाषाओँ में अनुवाद किया है.अपनी कविताओं के लिए उन्हें अन्य सम्मानों सहित पुलित्ज़र प्राइज़ भी मिल चुका है.वे अधिकतर बिना विराम आदि चिन्हों के मुक्त छंद में कविता लिखते हैं.यह कविता उनके संकलन 'प्रेजेंट कंपनी' से है..
इस कविता का मूल अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद -- रीनू तलवाड़


साभार :- http://anoodit.blogspot.in/

दामिनी के लिये श्रृद्धांजलियां !

मेरी झोली में !

मेरी झोली में
सपने ही सपने भरे
ले-ले आ कर वही
जिसका भी जी करे.

एक सपना है
फूलों की बस्ती का
एक सपना है
बस मौज मस्ती का,
मुफ्त की चीज है
फिर कोई क्यों डरे?

एक सपना है
रिमझिम फुहारों का
एक सपना है
झिलमिल सितारों का
एक सपना जो
भूखे का पेट भरे.
ले-ले आ कर वही
जिसका भी जी करे.

- रमेश तैलंग ( वरिष्ठ बाल-साहित्यकार) 
 
साभार :- http://balduniya.blogspot.in/

नव वर्ष कौन ?

आज नव वर्ष की धूम मची है|कृष्ण पक्ष है |शीतलता भी अपनी चंचलता इठलाते हुए प्रदर्शित कर रही है |आगे चैत्र शुक्ल पक्ष की पतिपदा से हम भारतीयों का नव वर्ष आता है | वस्तुतः इन दोनों में किसको नव वर्ष मानें , केवल अपनी अपनी मान्यताओं के आधार पर या कोई प्रबल प्रत्यक्ष प्रमाण के आधार पर ? आज पाश्चात्य जगत के इस नव वर्ष में मान्यताओं के अतिरिक्त कोई ऐसा प्रमाण या प्रकृति का समर्थन इसे नहीं प्राप्त है जिससे इसे नव वर्ष कहा जा सके | हाँ हमारे भारत वर्ष में जो नव वर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को मनाया जाता है ,उसका स्वागत स्वयं प्रकृति करती है | उस समय भारत का प्रत्येक व्यक्ति देख सकता है की वृक्ष स्वयं पतझड़ बीत जाने के कारण नूतन पत्ते धारण करते हैं |नयी नयी कोपलें मानों हमारे नव वर्ष के स्वागत हेतु खिलखिलाकर हंसती हुई उसका स्वागत करने को इठला रही हों |

जबकि इस पाश्चात्य नव वर्ष में ऐसा कुछ भी नहीं होता |हाँ इसका आरम्भ नृत्य नाटक नाना प्रकार के विलासिता पूर्ण संसाधनों से होता है | विदेशों की स्थिति तो बड़ी ही विचित्र है|वहां क्या क्या होता है ---इसका वर्णन हम नहीं कर सकते | इस नव वर्ष के मूल में हमें क्या देखने को मिलता है --मात्र दृश्य या अदृश्य रूप में "वासना " | जबकि हमारे नव वर्ष का शुभारम्भ उपासना से होता है | भारत के नगर ही नहीं अपितु गाँव -गाँव में नवरात्र के उपलक्ष में मानस का नवाह्न परायण , चंडी पाठ आदि विभिन्न धार्मिक आयोजन एवं साधकों की साधना आरम्भ होती है |

हमारे नव वर्ष का प्रकृति द्वारा स्वागत किया जाना अर्थात नूतन पत्तों कोपलों को धारण करके प्रकृति मानों इस तथ्य का डिमडिम घोष कर रही हो कि भारतवासियों जागो ,आँख खोलकर देखो कि वस्तुतः नव वर्ष कौन है ? जिसका मैं स्वागत कर रही हूँ ,वह है नव वर्ष ? या पाश्चात्यों का कपोल कल्पित नव वर्ष जिसमे मुझमे कोई नूतनता नहीं आती अथवा जिसका मैं कोई स्वागत नहीं करती |  कौन है नव वर्ष ? जिसके आरम्भ में विलासिता और वासना है वह ? या जिसके आरम्भ में धार्मिकता और उपासना है वह ?

विलासिता और वासना से नव जीवन का आरम्भ होता है या पतन ? उत्तर मिलेगा --पतन | विलासिता के कीड़े अनेक सम्राट पतन के गर्त में गिरे --इतिहास इसका साक्षी है |चाहे वे रावण की श्रेणी के हों या स्वयं रावण अथवा विलासी कोई मुग़ल शासक | किन्तु धार्मिकता और उपासना से नवजीवन का आरम्भ ही होता है , पतन नहीं |अत एव घास की रोटियाँ खाकर परम धार्मिक भगवान एकलिंग के उपासक महाराणा प्रताप सिंह ने देश को नवजीवन दिया , पतन के गर्त में गिरने से बचाया | इस विवेचन से सुनिश्चित हुआ की नव वर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से ही होता है ,आज जनवरी के आरम्भ से नहीं |

- आचार्य सियारामदास नैयायिक

सौ० सुचिता मिश्रा