Monday, March 7, 2016

नए जूते की महक और मेरा क़द !

पता नहीं क्यों
अक्सर जी करता है
याद करूँ
बचपन के उस क्षण को
काका ने लिवाया था मुझे
एक नया जूता का जोड़ा ।

नए जूते की महक को
पहली बार जाना था
काला जूता, चमकीला
पूरे मन को भा गया था
काका की हामी ने मेरा दिल भर दिया था

जैसे मेरे लिए ही बना था यह जूता
क्यूँ न याद करूँ उस क्षण को
पहली बार तो हो रहा था मैं
ज़मीन से थोड़ा ऊपर
जब मैं पहन कर जूता
पहली बार खड़ा हुआ था
ज़मीन पर

सब के सब क्षण भर में
थोड़े छोटे लगने लगे थे
झेंप गया था काका को देखकर मैं
भाँप लिया था काका ने इसे
कैसा है?
थोड़ा चलकर भी देखो
कहा था तत्काल ।


प्रस्तुति- संजीव बख्शी

साभार- जयप्रकाश मानस


No comments:

Post a Comment